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पार्श्विका

नेशनल इंस्टीट्यूट फाॅर इम्प्लीमेंटेशन रिसर्च आँन नॉन-कम्युनिकेबल डिजीजेज

न्यू पाली रोड, जोधपुर - 342005, भारत

फोन : 91-291-2722403

फैक्स : 91-291-2720618

ई मेल :  dir@dmrcjodhpur.nic.in

   

निदेशक दीर्घा

आधारभूत संरचना

दूर दृष्टया दस्तावेज

जन स्वास्थ्य में योगदान

शोध प्रकाशन

पृष्टभूमि                                                                                     Top

मरूस्‍थलीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केन्‍द्र, (डीएमआरसी) स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंञालय, भारत सकार के अंतर्गत जैव चिकित्‍सकीय अनुसंधान के लिए शीर्ष स्‍वायत संगठन, ‘भारतीय आयु‍र्विज्ञान अनुसंधान परिषद’ (आईसीएमआर) का एक स्‍थायी संस्‍थान है। क्ष्‍ोञ में व्‍याप्‍त स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं को समझने हेतु एवं उभरती स्‍वास्‍थ्‍य आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा राजस्‍थान के जोधपुर शहर में इस केन्‍द्र की स्‍थापना की गई, जो देश की मरूस्‍थलीय क्षेञ की स्‍वास्‍थ्‍य अनुसंधानिक आवश्‍यकताओं को पूरा कर सके।

डीएमआरसी की स्‍थापना 27 जून 1984 को हुई। केन्‍द्र ने जोधपुर, जयपुर ता बीकानेर स्थित अपनी तीन इकाइयों के साथ कार्य करना प्रारम्‍भ किया। जोधपुर जिले को मरूस्‍थल, जयपुर को गैर मरूस्‍थल तथा बीकानेर को नहर द्वारा सिंचित जिलेका प्रतिरूप लिया गया। एक व्‍यापक प्रारम्भिक स्‍वास्‍थ्‍य सर्वेक्षण किया गया जिससे क्षेञ की स्‍वास्‍थ्‍य तथा अस्‍वस्‍थता से जुडे कारकों की रूपरेखा तैयार की जा सके। प्रारम्भिक सर्वेक्ष्‍ाण की समाप्तिके पश्‍चात, वर्ष 1992 में तीनों इकाइयां मिलकर जोधपुर में एकरूप हो गई। तब से यह केन्‍द्र इस क्ष्‍ोञ की मुख्‍य स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के शोध व अनुसंधान कार्यो, जैसे मलेरिया, कुपोषण, सिलीकोसिस, तपेदिक, अफीम मुकित, रोगवाहक पारिस्थितिकी अध्‍ययन, कीटनाशकों की प्रतिरोधकता, चिकित्‍सकीय उपयोग के पौधे आदि के अध्‍ययन में जुटा हुआ है।

अनुसंधान में अपने अस्तित्‍व के दो दशकों की उत्कृष्ट तकनीकी याञा के साथ यह केन्‍द्र, मरू स्वास्‍थ्‍य हेतु एक राष्ट्रीय संस्‍थान का दर्जा प्राप्‍त करने के लिए दरवाजे पर खडा दस्‍तक दे रहा है। केन्‍द्र के कतिपय कार्य क्षैत्र, यथा मानव क्रिया विज्ञान, भौगोलिक जीनॉमिकस, पोषण की बिमारियां, प्रचालन अनुसंधान, रोगवाहक बिमारिया, चिकित्‍सकीय एवं कीटनाशक पौधे, संचारी रोग, असंचारी रोग, उन्‍्नत कार्यात्‍मक जैव उपादान, नैनों बायो इण्टरफेस, मरू वातावरण से संबंध स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं, सूखा, बाढ, अफीम सेवन, निर्जलीकरण, पानी के द्वारा फैलने वाले रोग, रेडियों समस्‍थानिक उपयोग, एनबीसी आंशकाएं एवं विपदा उतरोतर प्रबन्‍धन, केन्‍द्र को वह धरातल प्रदान करते है, जहॉ से केन्‍द्र, राष्ट्रीय व अन्‍तर्राष्ट्रीय स्‍तर पर मरू स्‍वास्‍थ्‍य के लिए एक अग्रणी भूमिका निभा सकता है। क्‍योंकि मरू क्षेञ पृथ्‍वी के धरातल का लगभग एक बटा सातवां हिस्‍सा है। भारत में तो यह समुचित धरा क्षेञ का 8.7 प्रतिशत है।

अधिदेश                                                                                      Top

  •  मरूस्‍थलीय क्षेञ की स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं पर शोध एवं इस शोध को बढावा देना।


  •  क्षेञ में विकास की गतिविधियों के साथ बदलती स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं का अध्‍ययन करना।


  •  स्‍थानीय व राज्‍य स्‍तरीय संस्‍थाओं को वैज्ञानिक व तकनीकी जानकारी से सशक्‍त करना।

वर्तमान आकर्षण क्षेत्र                                            Top

  • डेंगू विषाणु का प्रकृति में संवरण का अध्‍ययन करना। डीएचएफ व डेंगू के क्षेञीय जोखिमों का निर्धारण करना एवं एक ऐसे सर्वेक्षण की रूपरेखा तैयार करना जिससे राजस्‍थान में इस बीमारी के महामारी का पूर्वानुमान हो सके और उसके प्रबन्‍धन में मदद मिल सके।
  • मरू‍ क्षेञ में मलेरिया के रोगवाहकों की बायोनॉमिक्‍स एवं प्रचलन का अध्‍ययन, क्षेञीय जोखिमों का निर्धारण ताकि इस बीमारी की रोकथाम हेतु अनुकूल कार्य योजना का विकास हो सके।
  • कुपोषण के प्रचलन व वितरण का अध्‍ययन एवं उनके प्रबन्‍धन हेतु क्षेञीय समर्थित अन्तःक्षेप कार्यक्रम का विकास करना।
  • नीति निर्धारण हेतु, संचारी एवं असंचारी रोग भार का आंकलन एवं समय व क्षेञ में उनके संचरण का अध्‍ययन।
  • जीवन शैली से आबद्ध बीमारियों के जनपादपी का अध्‍ययन, क्षेञीय जोखिमों की पहचान एवं अन्तःक्षेपीय कदमों की प्रभाविता का स्‍थापन।

दूरदृष्टि - एक अग्रदर्शी कदम                                                              Top

जैसा कि मरूस्‍थलीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केन्‍द्र के दूर दृष्‍टया दस्‍तावेज से परिलक्षित होता है, यह केन्‍द्र मरूक्षेञीय जन स्‍वास्‍थ्‍य की समस्‍याओं हेतु एक उत्कृष्‍ट केन्‍द्र की पहचान हेतु कठिन प्रयास कर रहा है। स्‍वास्‍थ्‍य विकास शोध के क्षेञ में केन्‍द्र के भूत में योगदान के क्रम में इसकी भविष्‍य में कार्य की भू‍मिका भी मरू स्‍वास्‍थ्‍य से जुडी है।

आज के बदलते परिवेश में कोई भी संस्‍था स्‍वयं में कार्य नहीं कर सकती। अतः इस केन्‍द्र के सम्‍मुख भी भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के अन्‍य संस्‍थाओं के साथ एवं अन्‍य शोध संस्‍थाओं, यथा- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) एवं उसकी सहयोगी संस्‍थाए, क्षेञीय विश्‍वविद्यालय, आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, रक्षा संस्‍थान, वैज्ञानिक एवं तकनीकी परिषद (सीएसआईआर), तेल एवं प्राकृतिक गैस संस्‍था जो क्षेञ में स्‍थापित है के साथ समस्‍या भूत बन्‍धों के विकास की चुनौतियां है। केन्‍द्र के इन अनुबन्‍धों को ही केन्‍द्र की सफलता का अब मापदण्‍ड मानना होगा ताकि केन्‍द्र मरू क्षेञ की सभी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के निदान में मुखिया की भूमिका स्‍थापित कर सके। भौगोलिक चिकित्‍सकीय जानकारी, जो रक्षा से जुडी है, को सामरिक दृष्टि से प्राथमिकता मिलनी चाहिए। आज जरूरत है कि अन्‍य शोधकर्ताओं के साथ जुड कर उभयनिष्‍ठ कार्यक्रमों का आगाज हो ताकि उपलब्‍ध सुविधा व आधारभूत ढांचे का सही उपयोग हो सके।

जरूरत व अपेक्षाओं के अनुसार केन्‍द्र, मानव क्रिया विज्ञान, भौगोलिक जीनॉमिक्‍स पोषण व संबंधित बीमारियां प्रचलन अनुसंधान, रोग वाहक बीमारियां, चिकित्‍सकीय व कीटाणुनाशक पौधों, संचारी व अंसचारी रोगों के अध्‍ययन हेतु, प्रचलित निदानिक, जनपादिपी एवं प्रयोगशालीय तरीकों के साथ, आधुनिक जैव विज्ञानिक साधन यथा- जीनॉमिक्‍स, प्रोटोनॉमिक्‍स एवं प्राणी सूचना तंञ का भी उपयोग करेगा।

केन्‍द्र के भाविक शोध कार्यक्रमों में शामिल कतिपय शोध विषय है – शारीरिक क्रिया चरों का मरू वासियों में मानकीकरण ताकि आदमी का मरू वातावरण में सामन्‍जस्‍य का अध्‍ययन हो सके, बॉयो टेक्‍नोलॉजी उपयोग के साथ भौगोलिक व निदानिक विज्ञान का समन्वित अध्‍ययन, स्‍वास्थ्य मनुष्‍यों के शारीरिक द्रव्‍यों का प्रोटोनोमिक मानचिञण एवं इसमें दबाव व बीमारी की अवस्‍था में आए परिवर्तन, प्रतिरक्षीय अनुकूलन एवं प्रचालन और व्‍यवहारिक आवश्‍यकताएँ।

उपलब्धियॉ                                                                                         Top

वैज्ञानिक : मरूस्‍थलीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केन्‍द्र की कई वैज्ञानिक उपलब्धियां है।
  • प्रारम्भिक स्‍तर पर क्षेञ की स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं की समझ हेतु व्‍यापक सर्वेक्षण एवं अन्‍तर में त्‍वरित सूखा सर्वेक्षण जिसके अनुसार लघु एवं दीर्घ कालिक कुपोषण, रक्‍ताल्‍पता, कैलोरी की कमी, विटामिन ए व बी की कमियां व्‍यापक रूप से सामने आई। रोग वाहको के प्रकार व उनका वितरण एवं सामाजिक आर्थिक पार्श्विकी, इन सर्वेक्षणों से प्रकाशित हुए। क्‍यूलेक्‍स सूडोविश्‍नोई एवं क्‍यूलेक्‍स ट्राइटेनॉरिंकस, जो जापानीज इनसेफलाइटिज़ के रोग वाहक है और साधारणतया जो चावल के खेतों में पाए जाते है, प्रचुरता से इस क्षेञ में मिले।
  • विटामिन ए की कमी व नमक कार्यकर्ताओं की स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के लिए ' कैम्‍प एप्रोच' की उपादेयता की स्थापना ।
  • राष्ट्रीय नारू रोग उन्‍मूलन कार्यक्रम के लिए विशिष्‍टता का विकास । आईसीएमआर द्वारा केन्‍द्र के एक वैज्ञानिक को राष्ट्रीय नारू रोग उन्‍मूलन प्रमाणिकता समिति के सदस्‍य के रूप में मनोनयन।
  • प्रयोगशालायी वातावरण में एडिस एजिप्‍टाई रोग वाहकों में 7 वंशों तक अण्‍डों के द्वारा वायरस के संचरण का खुलासा जिससे प्रकृति में डेंगू वायरस के संवरण की अधिक समझ हो सकी, साथ ही मरू मलेरिया की अवधारणा।
  • पत्‍थर के खानो में काम करने वाले मजदूरों में सिलीकोसिस की रोकथाम हेतु मुखावरण एवं गीली छेदन प्रणाली की उपयोगिता का प्रर्दशन ।
  • राजस्‍थान जनजाति क्षेञों से स्‍वदेशी औषधीय पौधो का सार संग्रह।
  • 200 केडी प्रोटीन की मच्‍छरों के मध्‍य अपवर्तक आंत में उपस्थित का प्रर्दशन।
  • अफीम सेवन से जुडी वक्षीय क्षय रोग की संवेदनशीलता, पत्‍थर के खानों में काम करने वाले मजदूरों में ट्यूबर-सिलीकोसिस, कुपोषण एवं सम्बंधित विकार, पथरी एवं गावों में व्‍याप्‍त रक्‍तचाप का अध्‍ययन।
वैज्ञानिक

निदेशक
डॉ. जी. एस. टोटेजा

वैज्ञानिक

डॉ. मधुबाला सिंह, एम. एस. सी., पी. एच. डी., वैज्ञानिक - 'जी '
डॉ. प्रवीण कुमार आनन्द, एम. बी. बी. एस., एम.ए.ई., वैज्ञानिक - 'ई'
डॉ. एस एस मोहंती, एम. एस. सी., पी. एच. डी., वैज्ञानिक - 'ई'
डॉ. विकास धिकाव ,एम. बी. बी. एस., पी. एच. डी., वैज्ञानिक - 'डी'
डॉ. सुरेश यादव, एम. एस. सी., पी. एच. डी., वैज्ञानिक - 'सी '
डॉ. एलान्तमिलन डी ,एम. बी. बी. एस., एम डी., वैज्ञानिक - 'सी '
डॉ. रमेश कुमार सांगवान, एम. फिल., पी. एच. डी., वैज्ञानिक - 'बी'
श्री रमेश कुमार हुडा, बी.टेक., एम.टेक., वैज्ञानिक - 'बी'
डॉ. महेंद्र ठाकोर ,एम. बी. बी. एस., वैज्ञानिक - 'बी'

तकनीकी

श्री राजकुमार कालुंधा, एम. ए., वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी -III
श्री अनिल पुरोहित, एम. ए., वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी-I
श्री चेतराम मीना, एम. एस. सी., तकनीकी अधिकारी
श्री पंकज कुमार, एम. एस. सी., एम. फिल., तकनीकी अधिकारी
श्री रजनीश कुमार, वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी -II
श्री पूरणमल मीणा, वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी -II
श्री रमेश चन्द्र सिसोदिया, वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी -II
श्री रोहित प्रसाद जोशी, वरिष्ठ तकनीशियन - II
श्री राजेन्द्र चौहान, वरिष्ठ तकनीशियन - III
श्री त्रिलोक कुमार, तकनीशियन -II
श्री भंवर मनोहर सिंह, तकनीशियन - I

शासकीय

श्री दिनेश सोनी, प्रशासनिक अधिकारी
श्री नरेन्द्र बजाज, सलाहकार (प्रशासन)
श्री राजेन्द्र सिंह, अनुभाग अधिकारी
श्री जोगेन्द्र सिंह, अनुभाग अधिकारी
श्रीमती कंचन बाला, कनिष्ठ हिंदी अनुवादक
श्री शमशाद अली, सहायक
श्री सुनील बिश्नोई , सहायक
श्रीमती चन्द्रकला, वरिष्ट लिपिक
श्री पंकज शर्मा ,आशुलिपिक
श्री मनोहर सिंह सीरवी, वरिष्ट लिपिक
श्री हनीश सिंह भाटी , वरिष्ट लिपिक
श्री नन्दकिशोर, कनिष्ठ लिपिक
श्री राहुल सिंह सांखला, हिंदी टंकक

सहायक स्टाफ

श्री रघुनाथ सिंह, ड्राईवर
श्री मोहम्मद गफ्फार, ड्राईवर
श्री मनोहर सिंह, ड्राईवर
श्री राना राम, ड्राईवर
श्री प्रदीप सिंह जोधा , ड्राईवर
श्री बनवारी लाल, प्रयोगशाला सहायक
श्री लालचन्द, प्रयोगशाला सहायक
श्री रघुनाथ बिष्ट, प्रयोगशाला सहायक
श्री महावीर प्रसाद, प्रयोगशाला सहायक
श्री जोधाराम, प्रयोगशाला सहायक -III
श्रीमती लक्ष्मीकांता, प्रयोगशाला सहायक -III
श्री रामलाल, बहुकार्य कर्मचारी
श्री लादूराम, बहुकार्य कर्मचारी
श्रीमती सुआ देवी,बहुकार्य कर्मचारी
श्री राजकुमार, बहुकार्य कर्मचारी (तकनीकी)