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दूर दृष्टया दस्तावेज

प्रस्‍तावना

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) भारत सरकार की देश में जैव-चिकित्‍सकीय अनुसंधान के प्रतिपादन, समन्‍वयन एवं प्रोत्‍साहन के लिए एक शीर्ष संस्‍था है । भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य प्राथमिकताओं के अनुसार अपने कार्यक्रमों को निर्धारित करता है। इस अधिदेश के अनुरूप मरू क्षेत्र की विशिष्‍ट स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं हेतु विश्‍ोषकर विकास कार्यक्रमों के परिपेक्ष में ; वर्ष 1984 में राजस्‍थान के परिश्‍चमी क्षेत्र में, जोधपुर में मरूस्‍थलीय अयुर्विज्ञान अनुसंधान केन्‍द्र (डीएमआरसी) की स्‍थापना मरू क्षेत्र में एक प्रमुख केन्‍द्र के रूप में की गई।

मरू क्ष्‍ोत्र पृथ्‍वी के धरातल का लगभग एक बटा सातवां हिस्‍सा है। यह क्षेत्र चरम तापमान, अल्‍प वर्षा, पानी की कमी, अपचुर वनस्‍पति जीवन और विशिष्‍ट जैविक एवं वनस्‍प‍तीय संवर्ग द्वारा प्रदर्शित होता है। भारत का मरू क्षेत्र, प्रमुख रूप से गुजराज (21 प्रतिशत), हरियाणा और पंजाब (10 प्रतिशत) के अलावा राजस्‍थान में (69 प्रतिशत) है । राजस्‍थान की भूमि विस्‍तार का लगभग 40 प्रतिशत भाग, उष्‍ण मरू क्षेत्र से व्‍याप्‍त है जो पश्चिमोतर 12 जिलों को समाहित करता है और 225 लाख से अधिक जनसंख्‍या को (जनगणना, 2001) । क्षेत्र में अल्‍प वर्षा के अतिरिक्‍त, लगभग प्रति चौथा साल, सूखे का साल होता है। जिससे विशेषकर, बच्‍चे कुपोषण के शिकार होते है। दूरस्‍थ एवं दुर्गम क्षेत्रों में बसी विरल और बिखरी हुई आबादी को चिकित्‍सा सुविधाएं पहुचाना कठिन होता है। स्‍वास्‍थ्‍य प्रशासकों के लिए त्‍वरितप्रवासीय मानव व मवेशियों की आबादी के समक्ष प्रर्याप्‍त स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं पहुंचाना एक चुनौति होत है।

"मरू, मानव व स्‍वास्‍थ्‍य" विषय पर जयपुर में हुए (30 मई से 1 जून 1981) एक राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी से सामनेआया कि मरू वातावरण में कई ज्ञात व अज्ञात स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं हैं, जिनका निराकरण अपेक्षित है। इसी के तहत, मरू पारिस्थितिकी के संदर्भ में स्‍वास्‍थ्‍य अनुसंधान के मुदों को संबोधित करने हेतु, इस क्षेत्र में एक केन्‍द्र स्‍थापितकरने के विचार को समर्थन मिला।

अपने दो दशकों के अस्तित्‍व में, मरूस्‍थलीय अयुर्विज्ञान अनुसंधान केन्‍द्र (डीएमआरसी) ने जिन मुद्दों पर अपना योगदान दिया है वे हैं ; (i) मरू क्षेत्र की आबादी में पोषण से समंबंधित समस्‍याओं के आधारभूत ऑकडे। (ii) मरू की बदलती पारिस्थितकी में रोग वाहक व्‍याधियों के संचरण की समझ। (iii) अन्‍य स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं यथा सिलिकोसिस, उच्‍च रक्‍तचाप, पथरी, विशिष्‍ट मात़ शिशु मुदे एवं नारू रोग उन्‍मूलन । केन्‍द्र में कई चल रहे कार्यक्रम हैं - डेंगू, मलेरिया, रोगवाहक बॉयोनॉमिक्‍स, कीटनाशक प्रतिरोधकता, कीटाणुनाशक के रूप में प्रयुक्‍त पौधे, उच्‍च रक्‍तचाप, मधुमेह, असंचारी रोगों के जोखिमों का सर्वेक्षण एवं संवेदनशील आबादी में पोषण की कमी।

डीएमआरसी, मरू पारिस्थितिकी के विशेष संदर्भ में स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍याओं के लिए एक उत्‍क़ष्‍ट केन्‍द्र के रूप में स्‍थापित होने का कठिन प्रयास कर रहा है। केन्‍द्र ने अपने क्रियाकलापों को अनुसंधान से बढाकार शिक्षा तथा प्रशिक्षण तक कर लिया है। पी एच डी कार्यक्रम हेतु इसे मान्‍यता मिल गई है। अब जब यह केन्‍द्र अपने अधिदेश की पूर्ति हेतु सुगम रूप से आगे बढ रहा है । यह एक अवसर है कि इसके अधिदेश, दूरद़ष्टि व उददेश्‍य पर एक बार पुनर्विलोकन किया जाएं।


अधिदेश
  • मरू क्षेत्र की स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं पर अनुसंधान करना एवं उसे प्रोत्‍साहित करना।
  • क्षेत्र में विभिन्‍न विकासात्‍मक गतिविधियों के समक्ष बदलती स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं का अध्‍ययन।
  • क्षेत्रीय व राजकीय स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थाओं में विज्ञानिक व तकनीकी विशिष्‍टता का सशक्‍तीकरण।

दूरदृष्टि

मरू आबादी की स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के समाधान हेतु उत्‍कृष्‍ट चिकित्‍सकीय शोध केन्‍द्र के रूप में स्‍थापित होना।


कार्य आयाम

स्‍वास्‍थ्‍य अनुसंधान के क्षेत्र में केन्‍द्र पिछले योगदान के क्रम में एक मार्गदर्शिका के रूप में भविष्‍य में भी केन्‍द्र की भूमिका मरू केन्द्रित बनती है।

अपने अघिदेश से प्रेरित, डीएमआरसी सामान्‍य स्‍वास्‍थ्‍य अनुसंधानिक विष्‍ायों से परे उन अध्‍ययनों को करेगा जिससे मरू में बीमारी भार को समझा जा सके और इसके लिए एक केन्‍द्रक के रूप में, आईसीएमआर के अन्‍य केन्‍द्रों व संस्‍थाओं से तालमेल कर काम करेगा ताकि इन समस्‍याओं का हल निकाला जा सके।


मार्ग दर्शक सिद्वान्‍त

मरू केन्द्रित

डीएमआरसी का काम मरू केन्द्रित होगा। इस क्षेत्र के लोगों के स्‍वास्‍‍थ्‍य उन्‍नयन एवं आवश्‍यकताओं को समर्पित किन्‍तु, क्षेत्रीय स्‍वास्‍‍थ्‍य आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु यह सीमन भी नहीं होगा।

परिणाम उन्‍मुख

शोध कार्य सार्थक एवं प्रर्दिशत परिणाम के होंगे ।

अभिनव

केन्‍द्र नव प्रयोगों व शोध प्रणाली अपनाने का प्रयास करेगा ।

समावेशी

केन्‍द्र अपने लक्ष्‍यों की प्राप्ति हेतु, क्षेत्रीय, राष्‍ट्रीय स्‍तर पर महत्‍वपूर्ण अनुबंधों को विकसित करेगा।

प्रासंगिकता

केन्‍द्र प्रचलित एवं उभरते संवेदी क्षेत्रों में ज्ञान का विकास कर, स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली में सुधार हेतु संभव हल सुझाएगा।


लक्ष्‍य

केन्‍द्र एवं केन्‍द की वैज्ञानिक सलाहकार समिति (एस ए सी) के द्वारा भू‍त में केन्‍द्र के द्वारा किए गए कार्यो की समीक्षा के उपरान्‍त कुछ आकर्षण क्षेत्र व प्राथमिक लक्ष्‍यों का निर्धारण पूर्व में ही किया जा चुका है।

नई प्रतिबद्वता के साथ जैसा कि पूर्व में कभी नही, यह केन्‍द्र अपने अधिदेश के क्रियान्‍वयन के लिए, बदलते विज्ञानी एवं सामाजिक परिवेश में नई सोच के साथ्‍ा अपने कार्यो को बढा रहा है। अतः यह प्रतीत होता है कि डीएमआरसी भारत के मरु क्षेत्र की स्वास्थ्य समस्याओं के अनुसंधान, संदर्भ एवं प्रशिक्षण का एक उत्‍क़ष्‍ट केन्‍द्र बनेगा और मरू स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में राष्‍ट्रीय व अन्‍र्तराष्‍ट्रीय स्तर का संसाधन केन्‍द्र।

डीएमआरसी, मरू पारिस्थितिकी के संदर्भ में उभरते स्‍वास्‍थ्‍य अनुसंधानिक मुद्दों के समाधान हेतु स्‍थापित किया गया था। इस तरह डीएमआरसी द्वारा पोषित व क्रियान्वित वैज्ञानिक कार्यकम, मरू क्षेत्र के निवासियों के स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍याओं के निदान हेतु, गहरी पैठ वाले होने चाहिए। तेजी से बदलते लोगों के पारस्‍परिक संबंध वातावरण, जीवन परिस्थितियां जो व्‍यवहारिक समस्‍याओं के साथ विभिन्‍न संचारीव असंचारी बीमारियों की प्रक़ति पर असर डालते है गहन अध्‍ययन के विषय है। इन्‍हें गहराई से जानना व समझना होगा। इनमें से कई प्रतिपाद, न केवल मरू क्षेत्र के स्‍वास्‍थ्‍य विकास के लिए महत्‍वपूर्ण होगें बल्कि आर्थिकव सामरिक दृष्टि से भी उनका महत्‍व होगा।


क्षेत्र के लिए विशिष्‍ट अनुसंधान

मरू क्षेत्र में संचारी व असंचारी रोगों का अनुदैर्ध्‍य अध्‍ययन, बीमारी भार का आंकलन व बीमारियों का समय व क्षेत्र में संचरण एवं उपयुक्‍त अन्‍तःक्षेपीय कार्यक्रमों के लिए मरू विशिष्‍ट जोखिमों की पहचान। इसके अतिरिक्‍त, अपने अधिदेश को मजबूती प्रदान करने के लिए, नई पहल व नवीन शोध प्रकल्‍प, परिस्थितियों व अवसरों के अनुरूप लेने होंगें।

डीएमआरसी की समस्‍यक स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल प्रणाली के भाग के रूप में, न केवल अनुसंधान करने की जिम्‍मेदारी है बल्कि अपने अधिदेश अनुसार राज्‍य व स्‍थानीय स्‍वास्‍थ्‍य एजेन्सियों को वैज्ञानिक व तकनीकी विशेषज्ञता प्रदान करने की भी जिम्‍मेदारी है । यह जानकारी मात्र जन स्‍वास्‍थ्‍य के उन्‍नयन तक सीमित नहीं है, अपितु मरू क्षेत्र में प्रचलित बीमारियों के भार आंकलन द्वारा, बीमारियों में बढते खर्च पर अंकुश लगाने हेतु , विभिन्‍न शोध प्रकल्‍प लाने हेतु भी है । यह क्षेत्र में "सम्मिश्रित नैदानिक प्रक्रिया व अनुसधान" के लिए वांछनीय है । चुनौती है, वैज्ञानिक समझ व क्रियान्‍वयन के बीच बंध विकसित करने की, साथ ही अन्‍य केन्‍द्रों में हो रहे अनुसंधान की पुनराव़र्ति रोकने की।


बंध

आज के बदलते परिवेश में कोई भी संस्‍था स्‍वयं में कार्य नहीं कर सकती। अत- इस केन्‍द्र के सम्‍मुख भी भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के अन्‍य संस्‍थाओं के साथ अन्‍य शोध संस्‍थाओं यथा- भारतीय क़षि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) एवं उसकी सहयोगी संस्‍थाए, क्षेत्रीय विश्‍वविद्यालय, आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, रक्षा संस्‍थान, वैज्ञानिक एवं तकनीकी परिषद (सीएसआईआर), तेल एवं प्राक़तिक गैस संस्‍था जो क्षेत्र में स्‍थापित है के साथ समस्‍या भूत बन्‍धों के विकास की चुनौतियां है। केन्‍द्र के इन अनुबन्‍धों को ही केन्‍द्र की सफलता का अब मापदण्‍ड मानना होगा ताकि केन्‍द्र मरू क्षेत्र की सभी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के निदान में मुखिया की भूमिका स्‍थापितकर सके। भौगोलिक चिकित्‍सकीय जानकारी जो रक्षा से जुडी है, को सामरिक द्रष्टि से प्राथमिकता मिलनी चाहिए। आज जरूरत है कि अन्‍य शोधकर्ताओं के साथ जुड कर उभनिष्‍ठ कार्यक्रमों का आगाजहो ताकि उपलब्‍ध सुविधा व आधारभूत ढांचे का सही उपयोग हो सके।

किन्‍तु संस्‍थागत लक्ष्‍यों की प्राप्ति हेतु कुछ स्‍वास्‍थ्‍य अनुसंधान के प्राथमिक मुद्दों के हल खोजना आवश्‍यक है, ताकि लोगो के भैतिक, सामाजिक व मानसिक विकारों को दूर किया जा सके ।


भावी प्राथमिक अनुसंधान दिशाएं

एक स्‍वास्‍थ्‍य अनुसंधान संस्‍था की गुणवता का आंकलन सार्थक अनुसंधान से निर्धारित होता है। अधिदेश में संनिहित लक्ष्‍यों की प्राप्ति के लिए वांछिनीय है कि डीएमआरसी अपने अनुसंधानिक कार्यक्रमों की पुनः प्राथमिकता तय करे और मूल, निदानिक व प्रचालन अनुसंधान के लिए प्रभावी व कुशल रणनीति का विकास करे जो इसे अधिक विज्ञानी दर्शिता प्रदान करेगा।

अपने अस्तित्‍व के दो दशकों बाद यह आवश्‍यक समझा गया कि डीएमआरसी अपने गत योगदान के साथ भावी दिशा, अपने अधिदेश को ध्‍यान रखते हुए तय करे।

  • डीएमआरसी के स्‍वास्‍‍थ्‍य संबंधी कार्य की मरू में साधारणतयाः आते सूखों पर केन्द्रित होने चाहिए। अभी तक इन समस्‍याओं पर कृषि अनुसधान संस्‍थानों ने ही काम किया है।
  • इसी प्रकार कठिन परिस्थितियों में, लोगों व मवेशियों के पलायन से स्‍वास्‍थ्‍य पर प्रभाव का अध्‍ययन किया जाना चाहिए। इसके लिए पांरम्‍परिक प्रयोशालाओं से, सामाजिक/क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं में जाने की आवश्‍ययकता है। जरूरत है कि हम मरू क्षेत्र के लोगों की जीवन शैली, उनका खान पान, बच्‍चों की परवरिश व अन्‍य संबंधित स्‍वास्‍थ्‍य के मुददों का अध्‍ययन करें एवं उन्हें परखें।
  • केन्‍द्र को उन बीमारियों पर ध्‍यान केन्द्रित करना चाहिए जो उष्‍म वातावरण से संबंध रखती हैं (कम आर्द्रता व धूप की अधिकता) । उष्‍म, वातावरण जनित स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं हेतु पर्याप्‍त वैज्ञानिक जानकारी जुटानी होगी। ऐसी कुछ समस्‍याएं है - गर्मी से बेहोशी, गर्मी से हद्वयाघात, मरू विकिरण एवं मरू धूल से संबंधित बीमारियां।
  • उष्‍मीय वातावरण का सामाजिक व पर्यावरणीय संबंध, जिसका प्रभाव तपेदिक, एच आई वी, श्‍वसन प्रत्‍यर्जक/संक्रमण आदि रोगों पर होता है, का अध्‍ययन होना चाहिए।
  • आवश्‍यकता है कि हम जाने कि कैसे विकास की बढती गतिविधियों लोगों के जीवन और स्‍वास्‍थ्‍य को प्रभावित करती है।

विशिष्‍ट अनुसंधानिक मुददे

इस क्षेत्र में बचपन से वयोवृद्व अवस्‍था तक अफीम का सेवन एक विशिटता है। इस क्षेत्र से अनुसंधानिक परिणाम गहरी सोच प्रदान करेगे जिनका असर मादक पदार्थो के सेवन पर अनुसंधान से परे होगा। इनसे वह उतेजक जानकारी मिलेगी जो उतरोत्तर अध्‍ययनों के लिए लाभकारी सिद्व होगी। कुछ चिकित्‍सकीय तथ्‍य बताते है कि वक्षीय क्षय रोग की पूर्वानिदानिकीय, अफीम सेवन के लोगों से अफीम न सेवी लोगों में भिन्‍न है। अतः इस प्रक्रिया को समझना व अध्‍ययन करना वांछनीय है।

अन्‍य ध्‍यानाकषर्णीय अनुसंधानिक परिणामों में क्षेत्र के लोगों में विटामिट ए की कमी पाई गयी है। जबकि क्षेत्र में अधिकतम दुग्ध उत्‍पाद है और जोधपुर मक्‍खन व्‍यवसाय का एक बडा केन्‍द्र इसको एक सम्भाष्य कारण विकास के अन्‍तर्गत, लोगों की बदलती जीवन शैली है। जिसके कारण दुग्ध व दुग्ध उत्‍पादों का तो निर्यात होता है, ज‍बकि विटामिन ए गोलियों का आयात। इसी प्रकार, जोधपुर मिर्ची व्‍यवसाय का भी बडा केन्‍द्र है। अतः मिर्ची के प्रयोग का स्‍वास्‍थ्‍य पर प्रभाव का अध्‍ययन भी किया जाना चाहिए।

इस प्रकार केन्‍द्र को स्‍थानीय व क्षेत्रीय सामाजिक व व्‍यवहारिक मुददों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए ताकि अन्‍तःक्षेपीय विकास को वैज्ञानिक आधार मिल सके।


आकर्षण के क्षेत्र

आवश्‍यताओं व अपेक्षाओं के आधार पर यह केन्‍द्र पारम्‍परिक निदानिक, जन पादपीय प्रयोगशालायी तरीकों के साथ, आधुनिक जैव पदधतियों का यथा - जीनोमिक्‍स, प्रोटोनोमिक्‍स, जैव सूचना प्रणाली का प्रयोग निम्‍न आकषर्ण क्षेत्र में कार्य हेतु करेगा। आवश्‍यकता एवं प्राप्‍त परिणामों के आधार पर, विकसित प्रकल्‍पों का विस्‍तारण/ संवरणआदि किया जाएगा ताकि हम केन्‍द्र के सम्‍यक अधिदेश को प्राप्‍त कर सके।

  • मानव शरीर क्रिया विज्ञान : ऐसे अध्‍ययन जो मरू वातावरण में सामन्‍जस्‍य को समझा सके जो इससे संबंधित विकारों की व्‍याख्‍या कर सके, मरू व गैर मरू आबादी में मूग की सांद्रता व रसायन को समझा सकें, मूग की क्रियाविज्ञान का पथरी के होने का संबंध समझा सकें। मरू क्षेत्र में नमक का सेवन व ततजनित उच्‍च रक्‍तचाप, गुर्दे की बीमारियों आदि को समझा सके।
  • भौगोलिक जीनॉमिक्‍स : कठिन वातावणीय व परिस्थितियों में गुणसूत्रीय सामन्‍जस्‍य को समझने के अध्‍ययन।
  • पोषण और संबंधित बीमारियां : मरू पौधों में पोषक तत्‍वों का साधारण बीमारियों हेतु उपयोग के अध्‍ययन। मरू उत्‍पादों से पोषण पैकेजो का विकास। मरू आबादी में सूक्ष्‍म पोषण तत्‍वों की कमी एवं संबंधित विकार विशेषकर संवेदी आबादी, यथा बच्‍चे, महिलाएं एवं सामाजिक कमजोर व्‍यक्ति।
  • प्रचालन अनुसंधान : वे अध्‍ययन जो स्‍वास्‍थ्‍य सेवा वितरण प्रणाली की उपलब्‍धता, पहुंच पर्याप्‍तता, गुणवता एवं स्‍थयत्वि के लिए हों । जिनका उददेश्‍य स्‍वास्‍थ्‍य सेवा प्रदाताओं के लिए सस्‍ती, प्रभावी और टिकाउ प्रणाली का विकास करना हो (सरकारीव गैर सरकारी संस्‍थाओं हेत)
  • रोग वाहक बीमारिया : मरू क्षेत्र में रोगवाहकों एवं संबंधित बीमारियों का अध्‍ययन इनके उत्‍पादन, वितरण, व्‍यवहार व समय व क्षेत्र में संचरण की समझ प्रदान करता है। क्षेत्र विशेष में और साथ ही राष्‍ट्रीय स्‍तर पर, मलेरिया, डेगू की रोकथाम हेतु उनके निर्धारकों व पुर्वानुमापों पर अध्‍ययन।
  • चिकित्‍सकीय एवं कीटाणुनाशक पौधे : उपयोगी चिकित्‍सकीय पौधोंकी समग्रता, वितरण एवं जैव रसायनिक विश्‍लेषण मरू पौधों का वैकल्पिक चिकित्‍सकीय उपयोग। उनके तत्‍वों का अलगीकरण ताकि उनका अप्रत्‍यूर्जक अथ्‍ावा कीटनाशक के रूप में अध्‍ययन हो सके।
  • संचारी रोग : संवर्धित निदानिक उपाय एवं अन्‍तःक्षेपों के विकास हेतु क्षय रोग, एचआईवी एवं अन्‍य प्रचलित बीमारियों का अध्‍ययन।
  • अंसचारी रोग : मधुमेह, उच्‍च रक्‍तचाप, कैन्‍सर, हद्वय रोगों का जनपादकी अध्‍ययन एवं अन्‍तःक्षेपों का विकास।

सक्षमता विकास एवं तर्कसंगत संसाधन उपयोग

किसी भी अनुसंधानिक संस्‍था का मानव संसाधन एक अतिकीमती अवयव है। वैज्ञानिक बुद्विमान होते है पर भावुक भी । उनकी स़जनता का उपयोग सुनियोजित प्रकार से लक्ष्‍य केन्द्रित कार्यक्रमों हेतु किया जाना चाहिए।


कार्यकारो समूह

गुणवता एवं मागा के अनुरूप परिणाम सामूहिक प्रयत्‍नों से प्राप्‍त किए जाते है, यह सच है इसलिए डीएमआरसी मे वैज्ञानिक सार्थक परिणामों हेतु समूहों में कार्य करेगें। कार्यकारी समूहों की स्‍थापना, प्रशासनिक और समन्‍वयन हेतु की जानी चाहिए, जिनका आवश्‍यकतानुसार फैलाव अथवा पुनर्गठन होना चाहिए। किन्‍तु ये समूह, वैज्ञानिक विशेष की स्‍वाधींता जबावदेही को प्रभावित नही करेंगे।


नेतृत्‍व

अन्‍त में एक वैज्ञानिक संस्‍था में साधारणतयः नेतृत्‍व पर बल नही दिया जाता है । यह एक उपयोगी नीति नही है। एक अच्‍छा नेतृत्‍व एक ऐसे वातावरण का विकास कर सकता है, जो सकारात्‍मक तरीकों से शोध व स़जन पनपा सके। जहाँ अच्‍छे शोधकर्ताओं को आक़ष्‍ट किया जा सके एवं उन्‍हे बांधे रखा जा सकें। जहाँ चिंतनशील लोगों का प्रोत्साहन मिले । साधनों का विकास एवं उनका तर्कसंगत उपयोग हो। एसा शोध वातावरण बने, जहाँ उपलब्‍ध साधनों को पिरोकर प्रभावी विकास हो सके। यदि केन्‍द्र को विकास करना है तो ऐसा ही करना होगा। सभी स्‍तरों पर नेत़त्‍व को स्‍थापित व पोषित करना होगा।